अस्थमा और एलर्जी पर योग का प्रभाव


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योग का वैज्ञानिक तौर पर उपयोग क्रोनिक प्रतिरोधी फेफड़े के रोगों में सहायक चिकित्सा के रूप में, अच्छी तरह से फेफड़ों की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सुधार के साथ स्थापित किया गया है, जीवन सूचकांक की गुणवत्ता और ब्रोन्कियल उत्तेजना की युग्मित प्रतिक्रियाओं द्वारा नियमित रूप से औषधीय उपयोग में कमी हुई हैं |

(नागाराथ्ना और नागेन्द्र 1980, वेंम्प्ती, 2009) बेहेरा 1998 ने आसन और सांस लेने की तकनीक की विभिन्न किस्मों का इस्तेमाल किया, जिसमें उन्होंने योग चिकित्सा द्वारा 4 हफ्तों के दोरान क्रोनिक ब्रोंकाइटिस से पीड़ित रोगियों में श्वास कष्ट और फेफड़ों की कार्यक्षमता में प्रत्यक्ष सुधार की सूचना दी। यौगिक सफाई तकनीक जैसे कि नेति क्रिया (खारे गर्म पानी द्वारा नाक धोने की प्रक्रिया) अत्यधिक श्लेष्मा स्राव को हटाने एवं सूजन में कमी और ब्रोन्कियल अतिसंवेदनशीलता को कम करने तथा उत्तेजना को निर्धारित सीमा तक बढाता है| जबकि कपालभाती एक यौगिक श्वास तकनीक है, जो सशक्त साँस छोड़ने के माध्यम से प्रतिरोधक साँस छोड़ने की क्षमता को बेहतर बनाता है (स्तत्य्प्रथा 2001)| अविशिष्ट bronchoprotective या bronchorelaxing प्रभाव श्रीमान सिंह द्वारा (1980) स्वीकृत किए गए हैं| में सुधार करके रोगियों में जीर्ण गंभीर एयरवेज रुकावट वाले रोगियों को योग चिकित्सा द्वारा व्यायाम सहिष्णुता में सुधार लाया गया है, (टंडन 1988)। यह देखा गया है कि धीमी योगिक श्वसन प्रक्रिया मिनट वेंटिलेशन में वृद्धि के बिना, बेहतर रक्त oxygenation रखता है, ऊंचाई प्रेरित हाइपोक्सिया के दौरान सहानुभूति सक्रियण कम कर देता है (बर्नार्दी 2001) तथा कीमो-रिफ्लेक्स संवेदनशीलता को हाइपोक्सिया और हाइपर-केपनिया में कम कर देता हैं (इस्पिकुज्ज़ा, 2002) इन सभी तंत्रों की मदद से ब्रोंकाइटिस से ग्रसित रोगियों की स्थिति में उद्देश्यात्मक और व्यक्तिपरक सुधार लाया जा सकता हैं|

कई अध्ययनों से यह तथ्य प्राप्त हुए है कि योग द्वारा श्वास की समस्याओं से ग्रसित रोगियों की दशा में सुधार लेन के लिए योग प्रभावशाली हैं| विभिन्न अध्ययनों में से अधिकांश रूप से फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार के अनिश्चित तथ्य मिलते हैं| (बिर्केल एवं एग्रेन 2002, फ्लुज एवं अन्य 1999, जैन तथा अन्य खानम एवं अन्य १९९६, नागाराथ्ना और नागेन्द्र 1980, मकवाना एवं अन्य 1988, औषधि की मात्रा में गिरावट (कूपर एवं अन्य, वेदान्थ एवं अन्य 1998), स्वभाव और जीवन की गुणवत्ता में सुधार (मनोचा एवं अन्य) और लक्षणों में कमी (कूपर एवं अन्य 2003, सिंह 1987, टंडन 1978) अध्ययनों से यह पता चला है की श्वसन प्रकिया की समस्याओं में कमी आई है|

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