अष्टांग योग द्वारा सरल चिकित्सा


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'यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणा ध्यानसमाधयोष्टावंगानि।' (योगसूत्र 2/ 29)

अष्टांग योग अत्यंत महत्वपूर्ण साधना पद्धति है, योग से अध्यात्मिक प्रगति के साथ-साथ रोग निवारण भी किया जाता है, जिसका विस्तृत वर्णन पतंजलि ने योगसूत्र में किया है। अष्टांग योग के आठ अंग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि- बताए गए हैं:

1. यम

'अहिंसासत्यमस्तेयब्रह्माचर्यापरिग्रहा यमा: (योगसूत्र 2/30)

महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में पांच यम बताए हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रम्हचर्य व अपरिग्रह।

अहिंसा

किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार से पीड़ा न पहुंचाना अर्थात् मन में सभी जीवधारियों के प्रति प्रेमभाव रखना अहिंसा है। काम-क्रोध आदि भावनाओं के जाल में फंस कर शरीर, वाणी अथवा मन से किसी भी प्राणी को शारीरिक या मानसिक पीड़ा अथवा नुकसान पहुंचाना हिंसा है। पांचों यमों में अहिंसा को सर्वोत्तम माना गया है। यम के चार अंगों सत्य, अस्तेय, ब्रह्माचर्य, अपरिग्रह एवं नियमों का पालन अहिंसा की भावना को सुदृढ़ करने के लिए ही किया जाता है।

सत्य

सत्य वह है, जैसा देखा, अनुमानित किया या सुना हो- वैसा ही वर्णन करना। लेकिन इसकी एक और शर्त भी है - इस सत्य से प्राणियों का कल्याण होना चाहिए। महाभारत में प्राणी मात्र के लिए हितकारी सत्य को ही श्रेष्ठ बताया गया है।

अस्तेय

धर्म विरुद्ध, चोरी से या अन्यायपूर्वक किसी की चीजों को हड़प लेना स्तेय है। इसके विपरीत परायी वस्तु की ओर आकर्षित न होना, उसे ग्रहण न करना, उसकी अभिलाषा न रखना अस्तेय है।

ब्रह्मचर्य

उपस्थेन्द्रिय अर्थात् जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्माचर्य कहलाता है। उपस्थेन्द्रिय सभी इन्द्रियों में सबसे ज्यादा कामाग्नि को भड़काने वाली है। दूसरी इन्द्रियां भी कामोद्दीपन में सहायक होती हैं। इसलिए सभी इन्द्रियों को शान्त रखने के लिए उपस्थेन्द्रिय पर संयम करना चाहिए।

अपरिग्रह

चारों ओर से भोग साधनों को ग्रहण करना परिग्रह है। इसके विपरीत भोग साधनों को ग्रहण न करना अपरिग्रह कहलाता है। धन सम्पत्ति व भोग सामग्री को आवश्यकता से अधिक केवल अपने भोग के लिए संचित करना गलत माना जाता है।

 

2. नियम

'शौचसन्तोषतप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा:' (यो.सू. 2/32)

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में पांच नियम बताए हैं-शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान।

शौच

शौच दो प्रकार का होता है, बाह्य शौच एवं आभ्यन्तर शौच।

बाह्य शौच-मिट्टी, साबुन, जल आदि द्वारा शरीर के अंगों, साधना स्थल व वस्त्र आदि की शुद्धि करना, सात्विक आहार से मन को पवित्र रखना, यौगिक क्रियाओं द्वारा शरीर को निरोगी रखना बाह्य शौच है।

आभ्यन्तर शौच-यह आंतरिक शुद्धि का साधन है। मन की भीतरी नकारात्मक आदतों का परिष्कार करके उनकी जगह पवित्र विचारों को अपनाना, राग-द्वेष आदि विकारों की जगह मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा का पालन करना आभ्यन्तर शौच है।

संतोष

हमारे पास जो साधन उपलब्ध हैं, उनसे अधिक की इच्छा न करना संतोष है। संतोष का सवाल केवल भौतिक पदार्थों के विषय में ही उठाया जाता है। आध्यात्मिक स्तर पर संतोष की आवश्यकता नहीं होती। भौतिक पदार्थों की चाह का क्षीण पड़ जाना ही संतोष कहलाता है। इसके बाद साधक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। संतोष ही सुखों का मूल है जबकि असंतोष से केवल दु:ख मिलते हैं।

तप

जिस प्रकार घुड़सवारी में माहिर घुड़सवार बिगड़ैल घोड़ों को भी काबू कर लेता है, उसी प्रकार साधना से शरीर, प्राण, इन्द्रियों और मन को नियंत्रित कर लेना तप कहलाता है। हमारी ऊर्जा हर पल शरीर से बाहर की ओर बहती है। ऊर्जा के ऐसे प्रवाह को रोक कर उसका संचय करना और उसे ऊर्ध्वगति प्रदान करना ही तप है। भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहन करना तप है। तप के बिना योग भी सिद्ध नहीं होता।

स्वाध्याय

इसमें साधक अन्तर्मुखी होकर अपने चित्त और उसमें निहित विचारों का अध्ययन करता है। पवित्र पावन ओउम् का जप तथा मोक्ष मार्ग में प्रवृत्त करने वाले शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों, गीता आदि का अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है। इसमें 'स्व' का अध्ययन किया जाता है अर्थात् यह जानने का प्रयास किया जाता है कि 'मैं कौन हूँ।'

ईश्वर प्रणिधान

ईश्वर के प्रति श्रद्धा, प्रेम, समर्पण एवं भक्ति ही ईश्वर प्रणिधान है। शरीर, इन्द्रिय मन, प्राण, अंत:करण आदि से किए जाने वाले सभी कर्मों और उनके फलों को ईश्वर को अर्पित कर देना ईश्वर प्रणिधान कहलाता है।

3-आसन

'स्थिरसुखमासनम्' (यो.सू. 2/46 )

महर्षि पतंजलि के अनुसार जिस अवस्था में शरीर अपेक्षित समय तक सुखपूर्वक स्थिर रह सके, उसे आसन कहते हैं। उपर्युक्त सूत्र में पतंजलि ने आसन की परिभाषा, समय-सीमा व उसके लाभों का भी वर्णन किया है। इसका सार यह है कि जब तक शरीर में स्थिरता और मन में सुख की अनुभूति हो रही है, तब तक आसन में स्थिर रहें। जब स्थिरता, अस्थिरता में और सुख, दु:ख में परिवर्तित होने लगे, तो आसन बदल लेना चाहिए। आमतौर पर हम देखते हैं कि हमारा शरीर एक मिनट भी स्थिर नहीं रह पाता। कभी हम हाथ हिलाते हैं, तो कभी पैर। लेकिन आसन के अभ्यास से शरीर व चित्त में स्थिरता आती है और सुख की अनुभूति होती है। आसनों के अभ्यास से साधक को द्वन्द्व नहीं सताते। आसनों की संख्या का महर्षि पतंजलि ने कोई वर्णन नहीं किया है।

4-प्राणायाम

'तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:' (यो.सू. 2/49)

'प्राणस्य आयाम:', अर्थात् प्राण और आयाम इन दो शब्दों से मिलकर बना है प्राणायाम। प्राण एक जीवनी शक्ति है। इसके बिना प्राणी जीवित नहीं रह सकता। दूसरी ओर, आयाम का मतलब है प्राण का ठहराव या विस्तार करना। जन्म के साथ ही प्राणी में श्वास-प्रश्वास की क्रिया प्रारंभ हो जाती है। इस क्रिया का अभाव ही मृत्यु है। बिना पानी व भोजन के तो व्यक्ति जीवित रह सकता है, लेकिन बिना प्राण के जीवित नहीं रह सकता। प्राणायाम के द्वारा प्राण पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।

महर्षि पतंजलि प्राणायाम को परिभाषित करते हुए कहते हैं :

आसन की सिद्धि होने पर श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित कर लेना या उस गति का विच्छेद करना या प्राण का शरीर में विस्तार करना प्राणायाम कहलाता है। महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम के चार भेद बताए हैं-बाह्यवृत्ति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति व बाह्याभ्यंतर विषयाक्षेपी।

5-प्रत्याहार
महर्षि पतंजलि के अनुसार जो इन्द्रियां चित्त को चंचल कर रही हैं, उन इन्द्रियों का विषयों से हट कर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। अत: चित्त के निरुद्ध हो जाने पर इन्द्रियां भी उसी प्रकार निरुद्ध हो जाती हैं, जिस प्रकार रानी मधुमक्खी के एक स्थान पर रुक जाने पर अन्य मधुमक्खियां भी उसी स्थान पर रुक जाती हैं।

6-धारणा

'देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।' (यो.सू. 3/1)

प्रत्याहार के द्वारा जब इन्द्रियां अंतर्मुखी हो जाती हैं, तब वे अपने विषय को वृत्तिमात्र से ग्रहण करती हैं। अभ्यास की स्थिति में कुछ समय तक चित्त की वृत्ति ध्येय पर स्थिर हो जाती है, फिर अन्य वृत्ति चित्त में उत्पन्न होती है। तदुपरान्त धीरे-धीरे चित्त को पुन: उसी ध्येय पर स्थिर किया जाता है। अर्थात्, चित्त को वृत्ति मात्र से किसी स्थान में बांधना धारणा है। प्रत्याहार द्वारा इन्द्रियों को विषयों से हटा कर मन को शरीर में चक्र आदि स्थानों में लगाकर स्थिर करना धारणा है।

7 –ध्यान

'तत्र प्रत्यैयकतानता ध्यानम्' (यो.सू. 3/2)

पातंजल योग के अनुसार जिस स्थान विशेष पर धारणा की जाती है, उस स्थान पर वृत्ति के समान रूप से निरंतर बने रहने को ध्यान कहते हैं। ध्यान के समय चित्त अन्य विषयों से हट जाता है और केवल ध्येयविषयक वृत्ति का ही आवागमन होता है। ध्यान में तेल की धारा की तरह एक ही वृत्ति का प्रवाह होता रहता है। ध्यान मन को शान्त एवं एकाग्र कर अंतर्मुखी बनाने की एक अनूठी विधा है। यह साधक के भीतर स्थित काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग-द्वेष, अहंकार आदि विकारों को क्षीण कर देता है। तब साधक दिन भर के क्रियाकलाप करते हुए भी अपने भीतर स्थित परम चेतना के साथ जुड़ा रहता है।

8-समाधि
'तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूप शून्यमिव समाधि:' (यो.सू. 3/3)

ध्यान की अवस्था में ध्याता अर्थात् ध्यान करने वाला, ध्येय और ध्यान आपस में मिल जाते हैं। इससे ध्येय के यथार्थ स्वरूप का पता नहीं चल पाता। लेकिन जब ध्यान प्रबल हो जाता है, तब ध्येय का स्वरूप विराट होने लगता है और ध्याता अपने स्वरूप में सर्वथा शून्य जैसा होकर ध्येय को स्वरूपमात्र में देखने लगता है। समाधि की अवस्था में ध्येय का स्वरूप ध्याता और ध्यान से अलग होकर ध्येयाकार वृत्ति में पूर्णता से महसूस होने लगता है। जैसे नमक पानी में मिल जाने से उसके साथ एकरूप हो जाता है, उसी तरह जब आत्मा और मन की एकरूपता हो जाती है, तो वह अवस्था समाधि कहलाती है। समाधि के दो भेद बताए गए हैं-सम्प्रज्ञात (सविकल्प अथवा सबीज) समाधि व असम्प्रज्ञात (निविर्कल्प अथवा निबीर्ज) समाधि।

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