योग द्वारा साइनस (Sinus) की चिकित्सा व रोकथाम


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साइनस को आयुर्वेद में प्रतिश्याय नाम से जाना जाता है। सर्दी के मौसम में नाक बंद होना, सिर में दर्द होना, आधे सिर में तेज दर्द होना, नाक से पानी गिरना आदि इसके लक्षण हैं। इसके मरीज को हल्का बुखार, पलकों के ऊपर या दोनों किनारों पर दर्द तथा नाक और गले में कफ जमा रहता है। इसमें रोगी धूल और धुंआं बर्दास्त नहीं कर पाता है।

समय पर इलाज न होने पर साइनस (प्रतिश्याय) दमा जैसी गंभीर बीमारियों में बदल सकता है। इस रोग में नाक के अंदर की हड्डी के बढ़ जाने या तिरछी हो जाने के कारण श्वांस लेने में रुकावट होती है। इसके मरीज को ठंडी हवा, धूल या धुआं के उस हड्डी से टकराने पर तेज दर्द होता है। इस बीमारी की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है की इसमें नाक के साथ-साथ फेफड़े, आँख और मस्तिष्क भी प्रभावित हो जाते हैं। इन्फेक्शन के फ़ैलाने पर ये सभी अंग कमजोर हो जाते हैं।

यह श्वसन तंत्र में मदद करने वाली साइनस एक प्रकार की हवा भरी हुई कैविटी होती है। जिससे होकर ऑक्सीजन फेफड़ों में जाती है। जब बलगम निकलने का मार्ग रुक जाता है तो साइनस की बीमारी जन्म ले लेती है। इसके संक्रमण होने पर साइनस की झिल्ली में सूजन आ जाती है। जिसके कारण साइनस में हवा की जगह बलगम या मवाद भर जाता है। जिससे मस्तक, गालों व ऊपर के जबड़ों में दर्द होने लगता है। इस रोग में सर्दी हमेशा बनी रहती है। जिसे कुछ लोग सामान्य सर्दी समझकर इलाज नहीं करवाते हैं।

विभिन्न शोध एवं अध्ययन के अनुसार नियमित रूप से योग में क्रिया और प्राणायाम इसके प्रभावशाली उपाय हैं। योग की क्रियाओं में 'सूत्रनेति व जलनेति, प्राणायाम में अनुलोम-विलोम' करने के बाद पांच मिनट तक 'ध्यान' करने वाले लोगों से साइनस की बीमारी हमेशा दूर रहती है।

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